योगिनी एकादशी 2026: भरणी नक्षत्र और सिद्ध योग में रखा जाएगा व्रत, जानें धार्मिक महत्व

Shakshi Chauhan

10 जुलाई 2026

योगिनी एकादशी: गृहस्त जीवन जीने वालो के लिए ख़ास पुण्यदायी व्रत है, सनातन धर्म में साल भर में आने वाली सभी चौबीस एकादशियी का अपना अलग महत्व है। लेकिन हर मास की कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को खास तौर पर बहुत पुण्यदायी माना गया है। यह व्रत निर्जला एकादशी की कठिन साधना के बाद और देव शयनी एकादशी से ठीक पहला आता है। इस साल योगिनी एकादशी 10, जुलाई को रखी जाएगी।

धार्मिक मान्यता है की जो व्यक्ति सच्चे मन से यह व्रत करता है उसे 88 हज़ार ब्राह्मणों को भोजन करने के बराबर पूर्ण फल मिलता है। यही वजह है की इसे पापों को नास करने वाले और मोक्ष देने वाली एकादशी कहा जाता है । शास्त्रों में बताए गया है की इस व्रत को करने से इंसान के जाने अनजाने में किए गए सारे पाप मिट जाते हैं । और उसे जीवन में सुख समृद्धि और अच्छी सेहत की प्राप्ति होती है ।साथ ही मृत्यु के बाद स्वर्गलोक की प्राप्ति के भी मार्ग खुलता है।

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खास तौर पर गृहस्त जीवन जीने वाले लोगों के लिए यह व्रत बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारी और घर परिवार की व्यस्तता के बीच भी अगर कोई श्रद्धा से यह व्रत रखता है तो उस मानसिक शांति के साथ साथ पारिवारिक सुख समृद्धि आशीर्वाद मिलता है। यही कारण है की गृहस्थ और वैष्णव दोनों ही इस व्रत को उतनी ही आस्था से करता हैं। पंडितों का मानना है की व्यस्त जीवनशैली में भी अगर एक दिन भगवान के नाम समर्पित किया जाए तो इसे पूरे परिवार को इसका लाभ मिलता है।

ज्योतिषाचार के मुताबिक़ इस बार पंचगीय गड़ना के अनुसार एकादशी तिथि में शये हुआ है। 10 जुलाई की सुबह करीब सवा 8 बजे एकादशी तिथि शुरू होगी और यह अगले दिन यानी ग्यारह जुलाई की सुबह सूर्योदय होने से पहले ही समाप्त हो जाएगी। क्योंकि यह तिथि किसी भी सूर्योदय को नहीं छूती इसलिए इसे शय तिथि माना गया है। शास्त्रों के नियम के अनुसार एसी स्थिति में व्रत 10 जुलाई को ही रखा जाएगा।

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व्रत रखने वाले श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और भगवान विष्णु का ध्यान देते हुए व्रत संकल्प लेते है। दिन भर उपवास रखा जाता है और शाम को भगवान विष्णु की विधि पूर्वक अर्चना की जाति है। अगले दिन शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करके इसे पूर्ण किया जाता है।

धार्मिक ग्रंथों में इस व्रत का उल्लेख श्रीब्रह्मवेवर्त पुराण में मिलता है। जहाँ भगवान श्री कृष्ण ने ख़ुद युधिष्ठिर को इसका महत्व बताए था। यही वजह है की आज भी लाखो श्रद्धालु इस व्रत को पूरी आस्था और विश्वास के साथ करते हैं ताकि उन्हें सुख और समृद्ध जीवन की प्राप्ति हो सके।

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