हाल फिलहाल में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि भारत में बच्चों की सुरक्षा सबसे प्रायोरिटी में है और कानून किसी भी पर्सनल लॉ के ऊपर है। अदालत ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ शरिया में यदि किसी लड़की के बालिक होने को विवाह योगी आयु माना जाता है तब भी यह व्यवस्था बाल विवाह नितेश अधिनियम 2006 प्रोहिबिशन ऑफ़ चाइल्ड मैरिज एक्ट और पोक्सो एक्ट के प्रावधानों को नहीं बदल सकता।
अदालत का मानना है कि देश के सभी नागरिकों पर एक कानून लागू होगा और बच्चों की सुरक्षा सबसे पहले है। यह फैसला बुलंदशहर के एक मामले की सुनवाई के दौरान आया। मामला कुछ ऐसा था कि 16 वर्षा किशोरी के कथित बाल विवाह को रोकने पहुंची सरकारी रेस्क्यू टीम पर हुए हमले से जुड़ा था।
आरोपी ने अदालत में दलील की की मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार लड़की के युवावस्था में पहुंचने के बाद उसकी शादी की जा सकती है इसलिए उन्होंने उनके खिलाफ मामला दर्ज करवाया। हालांकि हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में बाल विवाह से जुड़े हुए मामलों की सुनवाई में एक महत्वपूर्ण जगह बनाएगा और एक अच्छी भूमिका निभा सकता है। इससे यह संदेश भी गया है कि बाल विवाह रोकने के लिए बनाए गए कानून का पालन करना बहुत जरूरी है और सभी धर्मों को यह पालन करना पड़ेगा।
हाई कोर्ट की पीठ ने कहा कि संसद द्वारा बनाए गए कानून का उद्देश्य बच्चों के अधिकारों और उनके भविष्य की रक्षा करने का है इसलिए कोई भी पर्सनल लॉ इस कानून को कमजोर नहीं कर सकता आदर्गत नहीं है अभी कहे कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को सामान सुरक्षा प्रदान करता है।
गौरतलब कि है बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के अनुसार लड़कियों की न्यूनतम विवाह आयु 18 वर्ष और लड़कों के 21 वर्ष है।
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यह वही पास्को एक्ट 2012 के तहत 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के साथ किसी भी प्रकार का यौन संबंध अपराध माना जाता है। इस फसलों को बाल अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है अदालत में यह स्पष्ट संदेश दिया है और बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि बच्चों के सुरक्षा टॉप प्रायरिटी में है और कोई भी धर्म का अकेला कानून नहीं चलेगा यह निर्णय भविष्य में ऐसे बाल विवाह रोकने के लिए अच्छा सबूत है।