जलवायु परिवर्तन का असर अब दुनिया के बर्फीले इलाकों पर और तेजी से दिखाई दे रहा है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 1979 से 2023 के बीच ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ की चादरों से करीब 11.3 ट्रिलियन मीट्रिक टन यानी लगभग 12.5 ट्रिलियन टन बर्फ कम हो गई। बर्फ के इस बड़े पैमाने पर नुकसान का सीधा असर समुद्र के बढ़ते जलस्तर पर पड़ा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस अवधि में वैश्विक समुद्र स्तर करीब 3.14 सेंटीमीटर बढ़ा है।
यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समूह आइस शीट मास बैलेंस इंटर-कम्पैरिजन एक्सरसाइज यानी IMBIE ने किया है। शोध में 27 अलग-अलग सैटेलाइट मिशनों से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अब तक ध्रुवीय बर्फ की चादरों में हुए बदलाव का सबसे व्यापक आकलन है।
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47 वर्षों में तेजी से बढ़ा बर्फ का नुकसान
अध्ययन के मुताबिक, ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से बर्फ के नुकसान की रफ्तार 1990 के दशक के बाद काफी तेज हुई। ग्रीनलैंड से बर्फ का वार्षिक नुकसान 1980 के दशक में करीब 66 अरब टन था, जो 2010 के दशक में बढ़कर लगभग 291 अरब टन प्रतिवर्ष हो गया।
इसी तरह, अंटार्कटिका में भी बर्फ के नुकसान की गति बढ़ी। 1980 के दशक में वहां से हर साल करीब 53 अरब टन बर्फ कम हो रही थी, जबकि 2010 के दशक में यह आंकड़ा 222 अरब टन से अधिक हो गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बदलाव धरती के बढ़ते तापमान और समुद्र के गर्म होने से जुड़ा है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि कुल बर्फ नुकसान में ग्रीनलैंड की हिस्सेदारी करीब 60 प्रतिशत रही, जबकि अंटार्कटिका से लगभग 40 प्रतिशत बर्फ कम हुई। आकार में अंटार्कटिका से काफी छोटा होने के बावजूद ग्रीनलैंड में बर्फ के नुकसान की मात्रा अधिक दर्ज की गई।
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बर्फ पिघलने से ज्यादा तेजी से समुद्र में पहुंच रही है बर्फ
वैज्ञानिकों के मुताबिक, बर्फ के नुकसान की मुख्य वजह केवल सतह पर बर्फ का पिघलना नहीं है। अध्ययन में पाया गया कि करीब 84 प्रतिशत बर्फ नुकसान ग्लेशियरों के तेजी से समुद्र की ओर खिसकने के कारण हुआ। इसके चलते बर्फ सीधे समुद्र में पहुंच रही है।
वहीं, लगभग 16 प्रतिशत नुकसान सतह पर बर्फ पिघलने और बर्फबारी के मुकाबले कम बर्फ जमा होने से जुड़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र का बढ़ता तापमान बर्फ की चादरों के निचले हिस्सों और किनारों को कमजोर कर रहा है। इससे ग्लेशियरों के समुद्र की ओर बहने की गति बढ़ रही है।
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2020 से 2023 के बीच दिखी अस्थायी राहत
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2020 से 2023 के बीच बर्फ के नुकसान की रफ्तार में कुछ कमी दर्ज की गई। इसकी प्रमुख वजह पूर्वी अंटार्कटिका में सामान्य से अधिक बर्फबारी और ग्रीनलैंड में अपेक्षाकृत ठंडी गर्मियां बताई गई हैं।
हालांकि, वैज्ञानिकों ने इसे स्थायी सुधार या बर्फ पिघलने की प्रक्रिया में बदलाव नहीं माना है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कुछ वर्षों तक दिखाई देने वाला अस्थायी बदलाव हो सकता है। लंबे समय में बर्फ की चादरों के नुकसान का रुझान अब भी चिंता का विषय बना हुआ है।
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समुद्र के बढ़ते स्तर से करोड़ों लोगों पर खतरा
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी का असर तटीय इलाकों पर रहने वाली आबादी पर पड़ सकता है। अध्ययन के अनुसार, समुद्र का स्तर करीब तीन सेंटीमीटर बढ़ने से हर साल लगभग 60 से 90 लाख अतिरिक्त लोग तटीय बाढ़ के खतरे में आ सकते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर बर्फ पिघलने की मौजूदा रफ्तार जारी रहती है, तो समुद्र के बढ़ते जलस्तर से तटीय शहरों, बंदरगाहों और निचले इलाकों में बाढ़ तथा कटाव का खतरा बढ़ सकता है। वैज्ञानिकों ने बर्फ की चादरों की लगातार निगरानी, तटीय इलाकों की बेहतर योजना और जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के प्रयासों की जरूरत पर जोर दिया है।





