सऊदी से तारिक रहमान को बुलावा, क्या ‘इस्लामिक NATO’ में शामिल होगा बांग्लादेश?

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सऊदी दौरे का न्योता दिया है। यह न्योता ऐसे समय आया है जब सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक नए रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसी वजह से सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस गठबंधन का दायरा आगे बढ़ाकर बांग्लादेश को भी इसमें शामिल करने की कोशिश हो रही है।

Palak Gupta

18 अगस्त 2026

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सऊदी से तारिक रहमान को बुलावा, क्या ‘इस्लामिक NATO’ में शामिल होगा बांग्लादेश?

दक्षिण एशिया में बढ़ते संबंधों के कारण भारत के लिए एक नया चिंताजनक मोड़ खड़ा हो सकता है। बता दें कि हाल ही में सऊदी अरब की तरफ से बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारीक रहमान को रियाद आने का निमंत्रण दिया गया है। बांग्लादेश की राजनीति में एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को लेकर हलचल तेज हो गई है।

रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि बांग्लादेश को भी इस्लामिक नाटो में शामिल करने की कल्पना की गई है। रिपोर्ट्स के अनुसार अगर ऐसी कोई भी साझेदारी होती है तो यह दिल्ली के लिए नई मुश्किलें पैदा कर सकती है। इसी के साथ यह भी खबर सामने आ रही है कि सऊदी अरब के एक अधिकारी ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारीक रहमान से मुलाकात भी की है और उन्हें क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की तरफ से सऊदी आने का न्योता सौंपा है।

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इस मुलाकात ने भारत के लिए यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कहीं सऊदी-तुर्की और पाकिस्तान का गुट बांग्लादेश को अपने साथ मिलाकर उसे अपने ‘इस्लामिक नाटो’ में शामिल करने की रणनीति बना रहा है? बता दें कि अगर बांग्लादेश इस गुट का हिस्सा बन जाता है तो भारत के पूर्वोत्तर और सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा के साथ-साथ बंगाल की खाड़ी पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

क्योंकि कई सालों से चीन की नजरें इस क्षेत्र पर गड़ी हुई है और ऐसे समय अगर बांग्लादेश तुर्की और पाकिस्तान को अपनी सीमा में बुलाता है तो यह भारत की सुरक्षा पर बड़ा खतरा हो सकता है।

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‘इस्लामिक नाटो’ की चर्चा क्यों शुरू हुई?

तारिक रहमान को सऊदी के बुलावे की खबर ऐसे समय आई है जब सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने 7 अगस्त को मक्का में एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसे ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौता’ कहा गया है। समझौते के तहत अगर किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है तो उसे सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। यही प्रावधान इसे नाटो की सामूहिक रक्षा व्यवस्था जैसा बनाता है और इसी वजह से इसे अनौपचारिक तौर पर ‘इस्लामिक नाटो’ कहा जा रहा है।

इसी के साथ तुर्की ने साफ किया है कि यह समझौता किसी मौजूदा गठबंधन को खत्म करने या उसकी जगह लेने के लिए नहीं बनाया गया है। समझौते में सैन्य अभ्यास, रक्षा तकनीक, हथियारों के संयुक्त विकास और उत्पादन के साथ-साथ ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है।

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तुर्की कनेक्शन क्यों अहम है?

 तुर्की की मौजूदा सरकार की विचारधारा ‘पॉलिटिकल इस्लाम’ पर आधारित है। इसी वजह से वह दुनिया भर के इस्लामी समूहों का प्रमुख सहयोगी है। सोमालिया से लेकर गाजा तक और इसमें दक्षिण एशिया के पाकिस्तान और बांग्लादेश में मौजूद ‘जमात-ए-इस्लामी’ भी शामिल है। हालांकि अपनी लंबी शाही और सूफी विरासत और यूरोप से नजदीकी के कारण उसमें एक तरह की नज़ाकत और समझदारी भी है।

इसके अलावा तुर्की इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अंकारा और पाकिस्तान के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा है और अब सऊदी अरब भी इसी कतार में जुट गया है। इस गठबंधन से तीनों देशों रक्षा और पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के बीच एक नया रणनीतिक संपर्क बनता दिखाई देगा।

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Palak Gupta is pursuing a Bachelor's in Journalism and Media Management and works as a News Writer at Khabar Mirror. She specializes in accurate,…और पढ़ें
Palak Gupta is pursuing a Bachelor's in Journalism and Media Management and works as a News Writer at Khabar Mirror. She specializes in accurate, credible, and reader-centric reporting, driven by a commitment to ethical journalism and continuous professional growth.