राजधानी दिल्ली में नाबालिगों के बीच बढ़ता अपराध अब सिर्फ कानून व्यवस्था का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह समाज और आने वाले समय के लिए गहरी चिंता का कारण बन चुका है। 12 से 17 वर्ष के किशोर तेजी से हत्या, लूट, चाकूबाजी और अन्य गंभीर घटनाओं में शामिल हो रहे हैं।
पुलिस की कार्रवाई जारी है, पर विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर परिवार और समाज ने मिलकर समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया तो हालात और कठिन हो सकते हैं।
कुछ वर्ष पहले तक निम्न आय वर्ग की बस्तियों में बच्चों की दुनिया खेलकूद तक सीमित थी। गलियों में गिल्ली डंडा, कंचे और क्रिकेट की आवाज सुनाई देती थी। अब कई जगह वही गलियां अपराध की खबरों से पहचानी जाने लगी हैं। जमीनी स्तर पर बात करने पर सामने आता है कि गरीबी, माता पिता की व्यस्तता, शिक्षा की कमी और गलत संगति बच्चों को भटका रही है।
अधिकतर मामलों में किशोर ऐसे परिवारों से आते हैं जहां रोजी रोटी की जद्दोजहद में अभिभावक सुबह से शाम तक घर से बाहर रहते हैं। बच्चों पर निगरानी कम हो जाती है और धीरे धीरे वे भावनात्मक रूप से भी दूर होने लगते हैं।
हाल के दिनों में सामने आए कई मामलों ने स्थिति की गंभीरता को और स्पष्ट किया है। मामूली विवाद से शुरू हुआ झगड़ा जानलेवा हमला बन जाता है। दोस्तों के बीच की बहस चाकूबाजी तक पहुंच जाती है। कई घटनाओं में आरोपी खुद नाबालिग पाए गए। इतनी कम उम्र में बढ़ती हिंसा यह बताती है कि भीतर कहीं गुस्सा, असुरक्षा और भटकाव गहराता जा रहा है।
पुलिस के आंकड़ों में भी गंभीर अपराधों में किशोरों की बढ़ती भागीदारी दिखाई दे रही है। हत्या, लूट और हमलों में पहले की तुलना में अधिक लड़के पकड़े जा रहे हैं। यह स्थिति सिर्फ कानून की चुनौती नहीं बल्कि सामाजिक ढांचे की कमजोरी को उजागर करती है। जब परिवार में संवाद कम होता है और बच्चों के पास सही मार्गदर्शन नहीं होता, तो वे आसपास दिखने वाले प्रभावों से सीखने लगते हैं।
मनोचिकित्सकों का कहना है कि कई बार हिंसक या नियम तोड़ने वाला व्यवहार साधारण शरारत नहीं होता। यह कंडक्ट डिसऑर्डर जैसी मानसिक समस्या का संकेत भी हो सकता है।
ऐसे बच्चे गलत काम को सामान्य मान लेते हैं, उन्हें दूसरों के दर्द का अंदाजा नहीं होता और वे आपराधिक छवि वाले लोगों को अपना आदर्श बना सकते हैं। धीरे धीरे छोटी गलतियां बड़ी वारदातों में बदल जाती हैं।
किशोरावस्था बहुत संवेदनशील समय है। इस उम्र में बच्चे सही और गलत दोनों रास्तों से तेजी से प्रभावित होते हैं। अगर घर से बातचीत, समझ और सहारा नहीं मिलता तो सड़क, मोबाइल और गलत दोस्त उनकी सोच तय करने लगते हैं।
कई पुलिस अधिकारी भी मानते हैं कि माता पिता रोज कुछ समय बच्चों से खुलकर बात करें, उनके दोस्तों और दिनचर्या के बारे में जानें, तो बड़ी घटनाओं को रोका जा सकता है।
सिर्फ सख्त कानून से समस्या खत्म नहीं होगी। जरूरत है कि बच्चों को बेहतर शिक्षा, खेल, कौशल प्रशिक्षण और काउंसलिंग मिले। परिवारों को भी यह समझना होगा कि थकान और आर्थिक दबाव के बावजूद बच्चों के साथ समय बिताना बेहद जरूरी है।
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हर बच्चा अपराधी बनना नहीं चाहता, लेकिन उपेक्षा और गलत माहौल उसे उस दिशा में धकेल देते हैं।
दिल्ली के सामने यह बड़ी चुनौती है, पर बदलाव संभव है। अगर समाज, स्कूल, पुलिस और परिवार साथ आएं, तो भटकते कदमों को फिर से सही राह दिखाई जा सकती है। बचपन को संभालना ही भविष्य को सुरक्षित करना है।










