अरबों-खरबों के नोटों पर छपने वाले गांधीजी महंगा पेन क्यों नहीं रखते थे? अपनाया था देसी जुगाड़

महात्मा गांधी की तस्वीर आज देश की करेंसी पर दिखाई देती है, लेकिन उनकी अपनी जिंदगी में दिखावे और महंगी चीजों की कोई खास जगह नहीं थी। लिखने के मामले में भी उनकी पसंद कुछ ऐसी ही थी। एक समय उनके पास महंगा फाउंटेन पेन था, लेकिन उसके चोरी हो जाने की घटना ने उन्हें काफी परेशान किया। इसके बाद उन्होंने ऐसी चीज इस्तेमाल करने से दूरी बनाने का फैसला किया, जो जरूरत से ज्यादा आकर्षक हो और चोरी का कारण बन सकती हो। आगे चलकर उन्होंने साधारण पेन होल्डर और निब का इस्तेमाल शुरू किया।

Palak Gupta

1 अक्टूबर 2026

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अरबों-खरबों के नोटों पर छपने वाले गांधीजी महंगा पेन क्यों नहीं रखते थे? अपनाया था देसी जुगाड़

 महात्मा गांधी की तस्वीर आज भारतीय नोटों पर छपती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उन्होंने एक महंगा फाउंटेन पेन चोरी होने के बाद उसका इस्तेमाल छोड़ दिया था? इतना ही नहीं, जब साधारण पेन की निब मुड़ गई, तो उन्होंने लकड़ी के दूसरे सिरे को छीलकर ‘किट्टा’ बना लिया। तो चलिए जानते है इसके पीछे का राज।

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एक समय उनके पास महंगा फाउंटेन पेन था, लेकिन उसके चोरी हो जाने की घटना ने उन्हें काफी परेशान किया। इसके बाद उन्होंने ऐसी चीज इस्तेमाल करने से दूरी बनाने का फैसला किया, जो जरूरत से ज्यादा आकर्षक हो और चोरी का कारण बन सकती हो। आगे चलकर उन्होंने साधारण पेन होल्डर और निब का इस्तेमाल शुरू किया। लेकिन एक दिन निब टेढ़ी हो गई और उसे बदलवाने में समय लग गया। गांधीजी के लिए समय बहुत कीमती था, इसलिए उन्होंने इसका भी देसी रास्ता निकाल लिया।

उन्होंने लकड़ी के होल्डर के दूसरे सिरे को नुकीला करके उसे पुराने जमाने में इस्तेमाल होने वाले किट्टा जैसा बना लिया। उनका मानना था कि ऐसी चीज सस्ती होने के साथ-साथ गांवों में आसानी से बनाई जा सकती है। गांधीजी का यह छोटा-सा प्रयोग उनकी सादगी और स्वदेशी सोच की बड़ी तस्वीर दिखाता है।

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महंगे फाउंटेन पेन से क्यों बनाई दूरी?

महात्मा गांधी के जीवन में सादगी सिर्फ कपड़ों या खान-पान तक सीमित नहीं थी। वे रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजों को लेकर भी काफी सोच-विचार करते थे। पेन भी इसी का एक उदाहरण है।

गांधीजी के पास एक महंगा फाउंटेन पेन था। एक समय वह पेन चोरी हो गया। बाद में उसकी जगह दूसरा पेन तो आ गया, लेकिन चोरी की इस घटना ने गांधीजी को परेशान किया। इसके बाद उन्होंने तय किया कि वे ऐसी आकर्षक और महंगी चीजों से बचेंगे, जिन्हें देखकर किसी को उन्हें चुराने का लालच हो सकता है। गांधीजी से जुड़ी इस घटना का उल्लेख ‘एवरीवन्स गांधी’ में भी मिलता है।

उनका फैसला सिर्फ पैसे बचाने तक सीमित नहीं था। गांधीजी की सोच में जरूरत और दिखावे के बीच साफ अंतर था। वे मानते थे कि अगर कोई साधारण चीज वही काम कर सकती है, तो उसके लिए महंगी चीज पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है।

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फाउंटेन पेन की जगह पेन होल्डर और निब

महंगे फाउंटेन पेन से दूरी बनाने के बाद गांधीजी ने पेन होल्डर और निब का इस्तेमाल शुरू किया। यह तरीका आज के समय में भले ही बहुत पुराना लगे, लेकिन उस दौर में यह लिखने का आम तरीका था।

इसमें एक लकड़ी या दूसरे पदार्थ का होल्डर होता था, जिसके आगे निब लगाई जाती थी। निब को स्याही में डुबोकर लिखा जाता था। गांधीजी को यह तरीका इसलिए भी पसंद था क्योंकि यह बेहद साधारण था और इसमें किसी महंगे सामान की जरूरत नहीं पड़ती थी।

लेकिन इस तरीके में एक परेशानी भी थी। निब कभी-कभी मुड़ जाती थी। ऐसी ही एक घटना गांधीजी के साथ हुई। निब टेढ़ी हो गई तो उसे बदलने के लिए उनकी सहयोगी मनु गांधी को भेजना पड़ा। इसमें समय लगा और गांधीजी को लगा कि इतनी छोटी-सी चीज के लिए भी काम रुक गया और फिर एक दिन यही से निकला देसी जुगाड़।

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मनु गांधी जब नई निब लेकर वापस लौटीं तो उन्होंने देखा कि गांधीजी लकड़ी के पेन होल्डर के दूसरे सिरे को नुकीला कर रहे थे। सवाल उठा कि आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ रही है?

गांधीजी ने बताया कि पुराने समय में लोग इसी तरह के किट्टा से लिखा करते थे। उनका विचार था कि इस तरह की चीज से लिखना आसान है, यह आसानी से खराब नहीं होगी और सबसे बड़ी बात यह कि इसके लिए पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यानी जिस समस्या के लिए कोई दूसरा व्यक्ति नया पेन खरीदने के बारे में सोच सकता था, गांधीजी ने उसका समाधान घर में मौजूद एक साधारण लकड़ी के टुकड़े से निकाल लिया।

कहा जाता है कि इसी किट्टा से लिखा गया पहला पत्र लॉर्ड माउंटबेटन को संबोधित था। यह छोटी-सी घटना गांधीजी के स्वभाव की एक अलग तस्वीर सामने रखती है। वे किसी चीज को सिर्फ इसलिए इस्तेमाल नहीं करते थे कि वह आधुनिक, महंगी या दूसरों से अलग है। उनके लिए यह ज्यादा मायने रखता था कि वह चीज जरूरत पूरी करती है या नहीं।

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महंगा पेन छोड़ने वाले गांधी के नाम पर बना था लाखों का पेन

दिलचस्प बात यह है कि जिस गांधीजी ने अपनी जिंदगी में महंगे फाउंटेन पेन से दूरी बनाई, उन्हीं के नाम और तस्वीर पर बाद में एक बेहद महंगा लक्जरी पेन भी बाजार में आया।

2009 में स्विस कंपनी मॉन्टब्लांक ने गांधीजी को समर्पित एक लिमिटेड एडिशन पेन पेश किया था। इसकी कीमत करीब 11 लाख रुपये बताई गई थी। बाद की रिपोर्टों में भारत में इसकी कीमत करीब 14 लाख रुपये तक बताई गई और इस पर विवाद भी हुआ।

विडंबना यही थी कि गांधीजी की पहचान सादगी, कम से कम जरूरतों और दिखावे से दूरी के साथ जुड़ी रही, जबकि उनके नाम पर बनाया गया पेन बेहद महंगा था। आज जब बाजार में पेन की कीमत कुछ रुपये से लेकर हजारों-लाखों रुपये तक हो सकती है, तब गांधीजी का वह साधारण किट्टा याद दिलाता है कि किसी चीज की कीमत हमेशा उसके महत्व को तय नहीं करती। जिस व्यक्ति की तस्वीर देश की करेंसी पर छपी है, उसने अपनी जिंदगी में एक साधारण देसी जुगाड़ को महंगे पेन पर तरजीह दी थी।

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लेखक परिचय
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Palak Gupta is pursuing a Bachelor's in Journalism and Media Management and works as a News Writer at Khabar Mirror. She specializes in accurate,…और पढ़ें
Palak Gupta is pursuing a Bachelor's in Journalism and Media Management and works as a News Writer at Khabar Mirror. She specializes in accurate, credible, and reader-centric reporting, driven by a commitment to ethical journalism and continuous professional growth.