मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान के राष्ट्रपति मुस्लिम देशों की एकता को लेकर बयान चर्चा में है अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते तनाव के बीच ईरान लगातार मुस्लिम देशों से एकजुट होने के लिए गुज़ारिश कर रहा है।
इसी बीच सऊदी अरब तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए एक नए रक्षा समझौते ने पश्चिम एशिया की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है।
ईरान के राष्ट्रपति का संदेश ऐसे समय में सामने आया है जब मुस्लिम देशों के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा और भविष्य की रणनीति को लेकर अलग-अलग रूप दिखाई दे रहा है। ईरान चाहता है कि मुस्लिम देश बाहरी शक्तियों पर निर्भर रहने की बजाय आसपास ही सहयोग बढ़ाये। ईरान की ओर से लंबे समय से इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि क्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा क्षेत्रीय देशों के पास होना चाहिए।
सऊदी अरब तुर्की और पाकिस्तान का बड़ा रक्षा समझौता
7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब तुर्की और पाकिस्तान में मक्का में एक महत्वपूर्ण संयुक्त रक्षा समझौता पर हस्ताक्षर किया। समझौता इस तहत तीनों देशों के बीच हुआ कि वह अपनी सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की कोशिश करेंगे और एक दूसरे का साथ देंगे इसका मुख्य संदेश है कि किसी एक सदस्य देश पर हमला होने की स्थितियों को तीनों देशों की सुरक्षा के लिए खतरा माना जाएगा।
यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं सऊदी अरब क्षेत्र की प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक शक्ति है तुर्की के पास मजबूत सैन्य और रक्षा तकनीकी क्षमता है जबकि पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है। ऐसे में तीनों देशों का एक साथ आना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
ईरान की चिंता क्यों बड़ी है
ईरान की नजर इस गत जोड़कर खास तौर पर है ईरान और सऊदी अरब के बीच पिछले कुछ वर्षों में रिश्तों में सुधार के प्रयास हुए थे लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा और ईरान की सैन्य गतिविधियों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी बने हुए हैं। ईरानी पक्ष से इस रक्षा समझौते की आलोचना भी सामने आई है।
ईरान के कुछ नेताओं और सांसदों ने इसे सुरक्षा की स्थिति गारंटी देने वाला कम मानने से इनकार कर दिया है उनका तर्क है कि केवल कागजी समझौते किसी देश को वास्तविक सुरक्षा नहीं दे सकते।
दूसरी तरफ सऊदी अरब तुर्की और पाकिस्तान ने अपने समझौते को रक्षात्मक और क्षेत्रीय स्थिरता बढ़ाने वाला कदम बताया है। तीनों देशों की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या संप्रदाय सैया गुट का निर्माण करना नहीं है।
शिया सुन्नी समीकरण भी अहम
इस पूरी घटनाक्रम में शिया सुनने समीकरण भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ईरान मुस्लिम दुनिया की प्रमुख शिया शक्ति है जबकि सऊदी अरब और पाकिस्तान सुन्नी बहुल देश है और तुर्की भी सुनी बाबुल आबादी वाला देश है हालांकि इस रक्षा समझौते को आधिकारिक तौर पर धार्मिक आधार पर बनाया गया गठबंधन नहीं बताया गया। लेकिन इसे राजनीतिक प्रभाव को समझने के लिए यह क्षेत्रीय समीकरण महत्वपूर्ण था।
ईरान और मुस्लिम देशों की एकता इसी व्यापक स्थिति में देखी जा रही है तेहरान जाता है कि मुस्लिम देश आपसी मतभेदों को कम करें और बाहरी सैन्य हस्तक्षेप के बजाय क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता दें।
Hormuz पर भी पूरी दुनिया की नजर
इस बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जल डमरू मध्य भी चर्चा के केंद्र में है। पारस की खाड़ी और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए यह समुद्री मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है। क्षेत्र में तनाव करने पर यहां जहाज की आवाजाही और तेल आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका रहती है।
यह भी पढ़ें: अयातुल्ला अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया गया, अंतिम विदाई में उमड़े लाखों ईरानी
ऐसे में सऊदी अरब तुर्की और पाकिस्तान का रक्षा सहयोग केवल सैन्य दृष्टि से ही नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए हाथ से भी काफी महत्वपूर्ण हो सकता है।
यह भी पढ़ें: हनी ट्रैप में फंसे IAF विंग कमांडर पर पाकिस्तान को रक्षा जानकारी देने का आरोप, गिरफ्तारी के बाद बढ़ी जांच
वहीं ईरान के लिए यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा रणनीतियों को नए सिरे से तैयार कर रहे हैं। कुल मिलाकर मुस्लिम एकता का संदेश और सऊदी अरब तुर्की पाकिस्तान का नया रक्षा समझौता पश्चिम एशिया में बदलते रणनीतिक समीकरणों को दिखाया जाता है।





