लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, कितने सांसदों का समर्थन जरूरी?

लोकसभा में 9 मार्च को स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी है। कांग्रेस के तीन सांसद यह नोटिस पेश करेंगे। प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए कम से कम 50 सांसदों का समर्थन जरूरी होगा, जिसके बाद सदन में इस पर चर्चा और वोटिंग हो सकती है।

न्यूज डेस्क - Khabar Mirror

10 मार्च 2026

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Lok Sabha Parliament Session Speaker Chair India

लोकसभा में सोमवार, 9 मार्च को स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात सामने आई है। कांग्रेस के तीन सांसद मोहम्मद जावेद, के. सुरेश और मल्लू रवि इस प्रस्ताव का नोटिस पेश करेंगे। सदन की कार्यवाही के दौरान यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बन सकता है।

नियमों के अनुसार, जब स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव का नोटिस दिया जाता है, तो उसे स्वीकार करने के लिए कम से कम 50 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। यदि चेयर के कहने पर 50 सदस्य अपने स्थान पर खड़े हो जाते हैं, तो नोटिस स्वीकार माना जाता है और इसके बाद सदन में इस पर चर्चा तथा मतदान की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

अगर 50 सांसद समर्थन में खड़े नहीं होते हैं, तो यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाता और उसे पेश ही नहीं किया जा सकता। इस कारण आज की कार्यवाही में सभी दलों की नजर इस बात पर रहेगी कि प्रस्ताव को कितने सांसदों का समर्थन मिलता है।

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने पहले ही संकेत दिया था कि ओम बिरला के खिलाफ यह प्रस्ताव 9 मार्च को लोकसभा में लाया जा सकता है। इस मुद्दे को देखते हुए सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ने अपने-अपने सांसदों को व्हिप जारी किया है ताकि वे इस चर्चा के समय सदन में मौजूद रहें।

विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर ने कई मौकों पर विपक्षी नेताओं को बोलने का पर्याप्त मौका नहीं दिया और सदन की कार्यवाही में पक्षपात किया। विपक्षी दलों का कहना है कि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के दौरान विपक्ष की आवाज दबाई गई।

वहीं प्रस्ताव में यह भी आरोप लगाया गया है कि स्पीकर ने कुछ विवादित बयानों पर सत्तारूढ़ दल के सांसदों को नहीं टोका। विपक्ष का कहना है कि ऐसे फैसले सदन के निष्पक्ष संचालन पर सवाल खड़े करते हैं।

संविधान के अनुसार, जिस स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव लाया जाता है, वह सदन में मौजूद रह सकते हैं और अपना पक्ष भी रख सकते हैं। हालांकि जब प्रस्ताव पर चर्चा चल रही हो, तब वह सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं कर सकते।

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लोकसभा में वर्तमान संख्या बल को देखते हुए राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार के पास बहुमत है, इसलिए यह प्रस्ताव पारित होना मुश्किल माना जा रहा है। फिर भी इस मुद्दे पर संसद में तीखी बहस होने की संभावना है।

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