विदेश से आने वाला पैसा, सुनने में यह बात जितनी सामान्य लगती है, उसके पीछे उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी और निगरानी जुड़ी होती है। आखिर यह पैसा भारत में कहां से आ रहा है, कौन इसे ले रहा है और इसका इस्तेमाल किस काम के लिए हो रहा है? इन्हीं सवालों को नियंत्रित करने के लिए देश में एक कानून है जिसका नाम है FCRA लेकिन अब इसी कानून में बदलाव को लेकर संसद में सियासी घमासान छिड़ा हुआ है। मामला इतना बढ़ा कि सरकार और विपक्ष के बीच खींचतान के बाद आखिरकार इसकी विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन कर दिया गया है।
क्या है FCRA और क्यों है इतना अहम?
FCRA यानी Foreign Contribution (Regulation) Act कानून भारत में किसी व्यक्ति, संस्था या गैर-सरकारी संगठन यानी NGO को मिलने वाले विदेशी योगदान को नियंत्रित करता है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल तय नियमों के मुताबिक हो और उसका इस्तेमाल देश के हितों के खिलाफ किसी गतिविधि में न किया जाए।
विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं के लिए FCRA के तहत पंजीकरण और उससे जुड़ी शर्तों का पालन करना जरूरी होता है। यही वजह है कि FCRA को लेकर होने वाला कोई भी बदलाव सीधे तौर पर विदेशी फंड हासिल करने वाली संस्थाओं और NGOs को प्रभावित कर सकता है।
FCRA संशोधन बिल पर क्यों शुरू हुआ विवाद?
अब इसी कानून में बदलाव के लिए केंद्र सरकार Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 लेकर आई है। बिल सामने आते ही विपक्ष ने इसके कई प्रावधानों पर सवाल उठाए।
विपक्षी दल जैसे कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके समेत विपक्षी दलों ने आशंका जताई कि प्रस्तावित बदलावों का असर NGOs और अल्पसंख्यक संस्थाओं पर पड़ सकता है। कुछ संगठनों की ओर से भी बिल के प्रावधानों को लेकर चिंता जाहिर की गई है। विपक्ष का कहना है कि विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने के नाम पर संस्थाओं पर जरूरत से ज्यादा सरकारी नियंत्रण नहीं होना चाहिए।
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सरकार ने क्या कहा?
सरकार की तरफ से विपक्ष के आरोपों को खारिज किया गया है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष से कहा कि वह बिल में ऐसा कोई प्रावधान बताए जो सीधे तौर पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो। सरकार का तर्क है कि विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है। अगर किसी प्रावधान को लेकर विपक्ष या किसी संगठन को आपत्ति है, तो उस पर संयुक्त संसदीय समिति के सामने विस्तार से चर्चा की जा सकती है।
ओम बिरला ने बनाई 31 सदस्यीय समिति
अब इस पूरे विवाद में नया मोड़ आया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने FCRA संशोधन विधेयक की जांच के लिए 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया है। इस समिति में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल हैं। बीजेपी सांसद संजय जायसवाल को समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। खास बात यह है कि समिति में सिर्फ सत्ता पक्ष के सांसद नहीं हैं, बल्कि कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, समाजवादी पार्टी, एनसीपी और दूसरे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया है। यानी अब बिल के प्रावधानों पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के सांसद बैठकर चर्चा करेंगे और अपनी राय रखेंगे।
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समिति के सामने क्या होगी चुनौती?
संयुक्त संसदीय समिति को बिल के प्रावधानों की बारीकी से जांच करनी होगी। समिति अलग-अलग पक्षों की चिंताओं पर विचार कर सकती है और जरूरत पड़ने पर संबंधित लोगों या संगठनों से भी राय ली जा सकती है।
समिति को अपनी रिपोर्ट संसद के शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के आखिरी दिन तक देने को कहा गया है। इसके बाद यह साफ होगा कि बिल के मौजूदा प्रावधानों में कोई बदलाव किया जाता है या सरकार अपने प्रस्ताव को उसी रूप में आगे बढ़ाती है।
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FCRA बिल में क्या बदल सकता है?
प्रस्तावित संशोधनों में विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं पर निगरानी और नियमों को लेकर कई बदलाव किए गए हैं। एक अहम प्रस्ताव FCRA प्रमाणपत्र से जुड़ा है। अगर किसी संस्था का प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो उसकी संपत्तियों को लेकर एक निर्धारित प्राधिकरण की भूमिका तय करने का प्रस्ताव है। इसी तरह के प्रावधानों को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि सरकारी निगरानी और संस्थाओं की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।
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अब आगे क्या होगा?
फिलहाल सबकी नजर संयुक्त संसदीय समिति पर है। समिति की बैठकों और चर्चा के बाद ही यह तस्वीर साफ होगी कि विपक्ष की आपत्तियों को कितना महत्व दिया जाता है और बिल में किन बदलावों की जरूरत महसूस होती है।
FCRA बिल की कहानी सिर्फ एक कानून में बदलाव की कहानी नहीं है। यह उस बड़े सवाल से भी जुड़ी है कि भारत में आने वाले विदेशी पैसे पर निगरानी कितनी होनी चाहिए और सामाजिक संस्थाओं को काम करने की स्वतंत्रता कितनी।
लोकतंत्र में किसी कानून की ताकत सिर्फ उसके सख्त होने में नहीं, बल्कि उसके बनने की प्रक्रिया में भी होती है। इसलिए अब असली परीक्षा सरकार और विपक्ष की बहस की नहीं, बल्कि उस समिति की होगी जो तय करेगी कि FCRA में बदलाव देश के हित, पारदर्शिता और संस्थाओं की स्वतंत्रता – तीनों के बीच सही संतुलन बना पाता है या नहीं।




