वैश्विक तनाव से दूर अमेरिका ने हाल ही में यह निर्णय लिया है कि वह वैश्विक राजनयिक मौजूदगी को सीमित करने की कोशिश में जुट गया है। अमेरिकी विदेश विभाग (State Department) ने कांग्रेस को पांच विदेशी मिशनों को बंद करने की जानकारी दी है।
इसमें एक दूतावास, कई वाणिज्य दूतावास और एक शाखा कार्यालय शामिल हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने कांग्रेस को बताया है कि वह पांच देशों में अपने दूतावास और वाणिज्य दूतावास बंद करने की तैयारी कर रहा है। बताया जा रहा है कि अमेरिका का यह फैसला दुर्लभ माना जा रहा है क्योंकि बिना किसी विशेष भू-राजनीतिक संकट के अमेरिका ने एक साथ कई विदेशी राजनयिक मिशनों को बंद करने का निर्णय काफी समय बाद लिया है।
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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जिन मिशनों को बंद करने का प्रस्ताव है, उनमें ग्रेनाडा के सेंट जॉर्ज स्थित दूतावास, जापान के नागोया, इंडोनेशिया के मेडन, कैमरून के डौआला और कनाडा के विनिपेग स्थित अमेरिकी मिशन शामिल हैं। बता दें कि अमेरिकी विदेश विभाग ने कुछ दिन पहले ही कांग्रेस की समिति को इस निर्णय के बारे में जानकारी दी थी।
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आखिर अमेरिका यह कदम क्यों उठा रहा है?
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि दुनिया के कई हिस्सों में ऐसे राजनयिक मिशन हैं, जहां गतिविधियां सीमित हैं और उनका संचालन सोच से काफी महंगा पड़ता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका का मानना है कि छोटे दूतावास और वाणिज्य दूतावास अब पहले जितने जरूरी नहीं रह गए हैं। ऐसे में सरकार ने यह फैसला लिया कि कम जरूरत वाले मिशन को बंद कर वह उन क्षेत्रों में पैसा लगाना ज्यादा सही समझेंगे जहां अमेरिका की जरूरतें ज्यादा हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से ही अमेरिका की पॉलिसी”America first” को मद्देनजर रखते हुए फाइनेंसियल फैसले लेते हैं। यह डिसिशन व्हाइट हाउस के ऑफिस ऑफ मैनेजमेंट एंड बजट (OMB) द्वारा चलाए जा रहे व्यापक खर्च कटौती अभियान का हिस्सा है।
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चीन-रूस को प्रभाव बढ़ाने का मिलेगा मौका
बता दें कि जबसे डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने यह फैसला लिया है तब से अमेरिका में इसका विरोध हो रहा है। डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं और कई पूर्व अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के कदम उठाने से दुनिया में अमेरिका का प्रभाव कमजोर पड़ सकता है।
उनके मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले से चीन और रूस जैसे देशों को अपना प्रभाव बढ़ाने का मौका मिल सकता है। हालांकि अमरीकी विदेश विभाग ने इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं दी है। विभाग का कहना है कि उसका लक्ष्य विदेशों में अमेरिका की राजनयिक मौजूदगी को अधिक प्रभावी और किफायती बनाना है।





