अमेरिका की नजरें इन दिनों दुनिया के अलग-अलग हिस्सों पर हैं और अब एक बार फिर वॉशिंगटन का सख्त रुख सामने आया है। ईरान पर दबाव बढ़ाने के बाद अमेरिका ने क्यूबा के खिलाफ भी अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। इस बार निशाने पर सिर्फ सरकारी संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि क्यूबा के पूर्व नेता राउल कास्त्रो के परिवार से जुड़ा एक बड़ा नाम भी आया है। नए प्रतिबंधों के ऐलान के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर अमेरिका क्यूबा पर इतना दबाव क्यों बढ़ा रहा है और इस कदम का असर वहां की पहले से मुश्किल आर्थिक स्थिति पर कितना पड़ेगा?
अमेरिकी सरकार ने क्यूबा के खिलाफ नए प्रतिबंधों का ऐलान किया है। अमेरिका ने राउल कास्त्रो के 31 वर्षीय पोते फिदेल अर्नेस्टो कास्त्रो कैलिस के साथ पांच क्यूबाई संस्थाओं को अपनी प्रतिबंध सूची में शामिल किया है। अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, इन संस्थाओं में क्यूबा का सरकारी बैंक Banco Exterior de Cuba और ऊर्जा और खनन क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां शामिल हैं।
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अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इन प्रतिबंधों का बचाव करते हुए क्यूबा के सत्तारूढ़ ढांचे पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि क्यूबा की सत्ता से जुड़े लोग प्रतिबंधों से बचने के रास्तों का इस्तेमाल करके आर्थिक फायदा उठा रहे हैं, जबकि आम क्यूबाई नागरिक आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं। वॉशिंगटन का दावा है कि नए प्रतिबंधों का मकसद क्यूबा के उस नेटवर्क पर दबाव डालना है, जिसे वह सत्ता के आर्थिक और वित्तीय ढांचे से जोड़ता है।
इस कार्रवाई में ऊर्जा और खनन क्षेत्र को भी खास तौर पर निशाना बनाया गया है। अमेरिका की ओर से प्रतिबंधित की गई संस्थाओं में क्यूबा की तेल आपूर्ति और ऊर्जा व्यवस्था से जुड़ी कंपनियां शामिल हैं। इनमें अबापेट भी है, जो क्यूबा की सरकारी तेल कंपनी के लिए जरूरी उपकरण और दूसरे सामान की खरीद से जुड़ी है। ऐसे में इन प्रतिबंधों का असर सिर्फ सरकारी कागजों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि क्यूबा की ऊर्जा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
क्यूबा पहले ही गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। देश में ईंधन की कमी और बिजली की समस्या ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ाई हुई हैं। लगातार बिजली कटौती के कारण रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है। ऐसे समय में ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगने से स्थिति और कठिन होने की आशंका जताई जा रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे क्यूबा के लिए जरूरी सामान और उपकरण हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
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दूसरी तरफ क्यूबा अमेरिका के इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता। क्यूबाई अधिकारियों ने देश की आर्थिक परेशानियों के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों और लंबे समय से चले आ रहे आर्थिक दबाव को जिम्मेदार ठहराया है। यानी दोनों देशों की कहानी बिल्कुल अलग-अलग नजरिए से सामने आ रही है। अमेरिका कह रहा है कि प्रतिबंध सत्ता के प्रभावशाली लोगों पर दबाव बनाने के लिए जरूरी हैं, जबकि क्यूबा का कहना है कि यही प्रतिबंध उसकी जनता की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि प्रतिबंधों के बीच क्यूबा अपनी अर्थव्यवस्था में कुछ बदलाव करने की कोशिश भी कर रहा है। हाल ही में वहां विदेशी निवेश, व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई नए आर्थिक सुधारों की घोषणा की गई है। यानी एक तरफ क्यूबा अपनी अर्थव्यवस्था को खोलने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ अमेरिका उस पर आर्थिक दबाव और बढ़ा रहा है।
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फिलहाल यह साफ है कि अमेरिका और क्यूबा के रिश्तों में तनाव कम होने के बजाय बढ़ता दिखाई दे रहा है। नए प्रतिबंध सिर्फ कुछ नामों और कंपनियों की सूची तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह वॉशिंगटन की उस रणनीति का हिस्सा हैं जिसमें क्यूबा की सत्ता और उससे जुड़े आर्थिक नेटवर्क पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सरकारों के फैसले भले ही रणनीतिक नजर आएं, लेकिन उनकी कीमत अक्सर देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता को चुकानी पड़ती है।





