अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा दावा किया है, जिसका असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। ईरान के साथ जारी संघर्ष के बीच ट्रंप ने कहा है कि युद्ध खत्म होने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट आएगी। उन्होंने तेल की कीमत 3 डॉलर प्रति गैलन तक आने और बाद में 2 डॉलर से भी नीचे जाने की बात कही है। अब सवाल भारत में उठ रहा है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सच में सस्ता होता है, तो क्या इसका सीधा फायदा भारतीय ग्राहकों को भी मिलेगा और पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम होंगी?
ट्रंप ने तेल की कीमतों को लेकर क्या कहा?
अमेरिकी राष्ट्रपति ने मंगलवार को कहा कि ईरान के साथ युद्ध खत्म होने के बाद तेल की कीमतें तेजी से नीचे आएंगी। ट्रंप के मुताबिक, कीमत पहले करीब 3 डॉलर प्रति गैलन तक आ सकती है और इसके बाद 2 डॉलर प्रति गैलन से भी नीचे जाने की संभावना है।
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल के बाजार में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। ईरान से जुड़े संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट में पैदा हुई अनिश्चितता ने वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ाई है। हालांकि, मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत सिर्फ युद्ध की स्थिति पर निर्भर नहीं है। मांग, सप्लाई, उत्पादन और समुद्री परिवहन जैसे कई कारक भी कीमत को प्रभावित करते हैं।
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भारत के लिए क्यों अहम है कच्चे तेल का दाम?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है। दूसरी तरफ अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक नीचे रहती है, तो भारत के लिए आयात लागत कम हो सकती है।
फिलहाल तस्वीर इसके उलट है। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत सितंबर की शुरुआत में करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई थी। तेल महंगा होने से भारत के लिए आयात का खर्च बढ़ता है और इसका दबाव रुपये, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
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क्या कच्चा तेल सस्ता होते ही पेट्रोल-डीजल भी सस्ता होगा?
यहीं सबसे महत्वपूर्ण बात है। कच्चे तेल की कीमत और पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमत एक ही चीज नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड सस्ता होने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के दाम उसी अनुपात में तुरंत कम हो जाएंगे।
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमत पर कच्चे तेल के अलावा रिफाइनिंग लागत, परिवहन, डीलर मार्जिन, रुपये और डॉलर की विनिमय दर तथा केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स का भी असर पड़ता है। इसलिए अगर क्रूड की कीमत में बड़ी गिरावट आती भी है, तब भी उसका पूरा फायदा ग्राहक तक पहुंचना जरूरी नहीं है।
मसलन, अगर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें नीचे जाती हैं लेकिन उसी दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो आयात की लागत पर दबाव बना रह सकता है। इसी तरह टैक्स और दूसरी लागतों में बदलाव नहीं होने पर पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमत में गिरावट सीमित रह सकती है।
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फिलहाल भारत में क्या स्थिति है?
भारत में ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद हमेशा उसी रफ्तार से नहीं बदलतीं। मौजूदा पश्चिम एशिया संकट के दौरान भी सरकारी तेल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ा है, जबकि घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश की गई है।
सरकार ने घरेलू ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने के लिए पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर भी अलग-अलग शुल्क लागू किए हैं। हालांकि, घरेलू बाजार में बिकने वाले पेट्रोल और डीजल के लिए इन शुल्कों में बदलाव का सीधा मतलब खुदरा कीमतों में बदलाव नहीं है।
इसलिए ट्रंप का दावा अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ी गिरावट में बदलता है, तो भारत के लिए यह राहत की खबर जरूर होगी। लेकिन पेट्रोल-डीजल कितना सस्ता होगा, यह सिर्फ क्रूड ऑयल की कीमत तय नहीं करेगी। कच्चा तेल सस्ता होना राहत की पहली सीढ़ी है, लेकिन उस राहत का असर पेट्रोल पंप तक कितना पहुंचेगा, यह रुपये की कीमत, टैक्स और घरेलू लागत समेत कई दूसरे कारकों पर निर्भर करेगा।





