भारत कई सालों से निरंतर रूप से अपनी मजबूती की तरफ काम करता नजर आ रहा है। बता दें कि हाल ही में भारतीय नौसेना की ताकत को दोगुनी करने वाली करीब 90 हजार करोड़ रुपये की बड़ी पनडुब्बी डील अब अंतिम दौर में पहुंच गई है।
भारत में जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन ने गुरुवार को कहा कि भारत और जर्मनी के बीच अगली पीढ़ी की पनडुब्बियों के लिए बहुत जल्द एक समझौते पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। समाचार आ रही हैं कि भारत और जर्मनी प्रोजेक्ट-75I पनडुब्बी समझौते को अंतिम रूप दे रहे हैं।
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पीटीआई न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक भारत ने जर्मनी से यह समझौता पूरे 8 अरब यूरो का खर्चा करने का प्लान किया है जिसका इस्तेमाल भारत की आने वाली अगली पीढ़ी की 6 पारंपरिक पनडुब्बियां बनाई जाएंगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह उम्मीद की जा रही है कि थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) और भारत की जानी-मानी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स नामक कंपनी इस समझौते पर हस्ताक्षर करेंगी।
बताया जा रहा है कि भारत का यह कदम समुद्र सेना पर अपनी पकड़ मजबूत और पक्का करने के लिए इस बड़ी रक्षा सौदे की तरफ बढ़ा है। भारत की कंपनी के साथ जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स इन पनडुब्बियों का निर्माण करने में सहायक होंगी। जर्मनी कंपनी TKMS भारतीय भागीदारों का एक नेटवर्क बना रही है। वहीं दूसरी ओर जर्मन कंपनी ने हैदराबाद के वीईएम टेक्नोलॉजीज के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं जिसका मुख्य मकसद पनडुब्बियों को लेटेस्ट मोडर्निज़ेशन देना है।
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भारत में ही बनेंगी छह पनडुब्बियां
इस सौदे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि छह पनडुब्बियों का निर्माण भारत में किया जाना प्रस्तावित है। इससे देश में पनडुब्बी बनाने की क्षमता को बढ़ावा मिलेगा और रक्षा क्षेत्र में विदेशी तकनीक के साथ भारतीय उत्पादन को आगे बढ़ाने का मौका मिलेगा। टीकेएमएस और मझगांव डॉक के बीच प्रोजेक्ट-75 आई को लेकर आधिकारिक बातचीत पहले ही शुरू हो चुकी है।
इन पनडुब्बियों में हवा से स्वतंत्र प्रणोदन यानी एआईपी तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। आसान भाषा में समझें तो यह तकनीक पनडुब्बी को लंबे समय तक पानी के अंदर रहने में मदद करती है। इससे उसे बार-बार सतह पर आने की जरूरत कम पड़ती है और दुश्मन की नजर से बचकर लंबे समय तक समुद्र के भीतर अभियान चलाना आसान होता है।
मुंबई की कंपनी के साथ पार्टनरशिप
बता दें कि हाल ही में TKMS ने नोटिस जारी करते हुए बताया कि कंपनी ने CAFAF फ्लुइड कंट्रोल के साथ एंटी-सबमरीन वारफेयर सिस्टम्स में भी समझौता किया है। इसके अलावा सिस्टम को और मजबूत बनाने के लिए कंपनी ने DRDO के साथ भी टाई-उप किया है। इस समझौते और पनडुब्बियों के निर्माण से भारत और जर्मनी साथ मिलकर रक्षा क्षेत्र में सबसे आधुनिक गिने जाएंगे।
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चीन और हिंद महासागर के बीच क्यों अहम है यह सौदा?
हिंद महासागर में चल रही गतिविधियों के कारण जिसमें चीनी पनडुब्बियों की गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं जिसकी वजह से भी भारत इस समझौते को अहम मान रहा है, दरअसल भारत को लगातार कुछ समय से समुद्र के अंदर काम करने वाली पनडुब्बियों की जरूरत है। प्रोजेक्ट -75 आई के जरिये भारत में आधुनिक पनडुब्बी निर्माण की क्षमता बढ़ाने और विदेशी तकनीक को देश में लाने पर भी जोर है।





