Plastic Currency Notes: RBI के पेपर नोट से कितने अलग और कितने महंगे नए नोट?

भारत में एक बार फिर चल रही है नोट बदलने की बात। आरबीआई लाने की बात कर रहा है देश में प्लास्टिक के नोट। क्या आरबीआई की इस बार की रणनीतियां देंगी राहत या फिर से लगेगी भीड़? जानिए अभी तक की क्या है लेटेस्ट अपडेट।

Palak Gupta

11 जून 2026

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Plastic Currency Notes: RBI के पेपर नोट से कितने अलग और कितने महंगे नए नोट?

भारतीय रिजर्व बैंक के नए प्लास्टिक नोट लाने की चर्चा पूरे भारत में देखने को मिल रही है। बताया जा रहा है कि यह फैसला रिजर्व बैंक ने इसलिए लिया है क्योंकि वे मुद्रा व्यवस्था को सुरक्षित बनाना चाहते हैं। भारत में करेंसी नोटों की छपाई एक बहुत बड़ा वित्तीय काम है, जिस पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं।

RBI के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024–25 में यह खर्च करीब 6,372 करोड़ रुपये तक पहुँच गया, जो पिछले साल के मुकाबले काफी ज्यादा है। यदि पिछले साल का आंकड़ा देखा जाए तो वह 5,101 करोड़ रुपये था। यह पैसा सिर्फ नए नोट छापने के लिए नहीं बल्कि पुराने गले-फटे नोटों को बदलने में भी इस्तेमाल किया जाता है, इसके साथ बड़ी लागत सुरक्षा और सप्लाई चेन में भी खर्च की जाती है। जिस प्रकार नोट का इस्तेमाल बढ़ता है, वैसे ही खर्च और भी बढ़ जाता है।

कुछ समय पहले RBI की बड़ी बोर्ड मीटिंग पटना और मुंबई में हुई, जिसमें प्लास्टिक यानी पॉलिमर के नोट लाने पर चर्चा की गई थी। मीटिंग का सबसे बड़ा कारण छपाई पर होने वाला लगातार खर्च, बाजार में नकदी के तेजी से बढ़ते सर्कुलेशन की मांग और वर्तमान में चल रहे कागज़ के नोट की कम उम्र जैसी गंभीर चुनौतियां हैं। इसकी हल ढूँढने हेतु बैठक पहुँची और पॉलिमर नोट्स को पेश करने के परामर्श पर।

पॉलीमर नोट होते क्या हैं?

पॉलिमर या प्लास्टिक नोट खास तरह के सिंथेटिक पदार्थ से बनाए जाते हैं, जिसका नाम पॉलीप्रोपीलीन प्लास्टिक है I यह सामान्य कागज से अलग होते हैं। इन नोटों में एक पतली प्लास्टिक शीट का इस्तेमाल होता है जिस पर प्रिंटिंग की जाती है। ये नोट पानी, धूल और फटने से काफी हद तक सुरक्षित रहते हैं और इनकी उम्र भी सामान्य कागजी नोटों से ज्यादा होती है। इसी वजह से कई पश्चिमी देशों ने इसे अपनाना पहले ही शुरू कर दिया था।

कागजी नोटों को छापने में कितनी लागत आती है?

कागज के नोट छापने की लागत भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा तय की जाने वाली एक अहम प्रक्रिया है, जिसमें हर नोट के मूल्य के हिसाब से खर्च अलग होता है। आम तौर पर ₹10 का नोट छापने में लगभग ₹1 से ₹1.5, ₹20 से ₹50 के नोट में करीब ₹1.5 से ₹2.5, ₹100 के नोट में लगभग ₹2.5 से ₹3.5 और ₹500 के नोट में लगभग ₹2.5 से ₹4 का खर्च आता है।

ये लागत सिर्फ कागज और स्याही तक ही सीमित नहीं होती, इसमें नोट की सुरक्षा के लिए लगाए जाने वाले वाटरमार्क, सिक्योरिटी थ्रेड जैसे एडवांस फीचर्स भी शामिल हैं। इसके अलावा खास बैंकनोट पेपर, हाई-सिक्योरिटी इंक, प्रिंटिंग मशीनों का ऑपरेशन, और नोटों को RBI से बैंकों तक पहुँचाने की पूरी लॉजिस्टिक व्यवस्था भी इसी खर्च का हिस्सा होती है। भारत में नोट छापने पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं, जो इस बात पर निर्भर करता है कि बाजार में कितने नए नोटों की जरूरत है और कितने पुराने नोट बदलने हैं।

पॉलीमर नोट को बनाने की लागत कितनी आती है?

पहली बार प्लास्टिक के नोट छापना निश्चित रूप से सामान्य कागजी नोटों की तुलना में काफी महंगा होता है। इसका मुख्य कारण इसमें इस्तेमाल होने वाली खास पॉलीमर सामग्री यानी बीओपीपी और पॉलिमर शीट और उसकी प्रोसेसिंग तकनीक है, जिन्हें कॉपी करना मुश्किल होता है। दूसरी तरफ, कागजी नोट अपेक्षाकृत सस्ते और आसानी से बन जाते हैं। इसलिए जब कोई देश पहली बार प्लास्टिक नोट अपनाता है, तो शुरू में उसे ज्यादा निवेश करना पड़ता है, जिससे यह तुरंत ही महंगा विकल्प बन जाता है।

अगर सीधे तौर पर तुलना करें तो कागज़ के नोट बनाना अभी सस्ता है, लेकिन प्लास्टिक के नोट लंबे समय में ज्यादा किफायती साबित हो सकते हैं। यानी शुरू में खर्च ज्यादा है, लेकिन समय के साथ बचत ज्यादा होने की संभावना है। यही वजह है कि RBI इसे पूरी तरह लागू करने से पहले सावधानी से देख रहा है। फिलहाल पूरे देश में कागज़ के नोट चालक है, और कहा जा रहा है कि प्लास्टिक के नोट को उन्हें बदलने में काफी समय लग सकता है।

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Palak Gupta is pursuing a Bachelor's in Journalism and Media Management and works as a News Writer at Khabar Mirror. She specializes in accurate,…और पढ़ें
Palak Gupta is pursuing a Bachelor's in Journalism and Media Management and works as a News Writer at Khabar Mirror. She specializes in accurate, credible, and reader-centric reporting, driven by a commitment to ethical journalism and continuous professional growth.