भारत की अर्थव्यवस्था ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की विकास दर दर्ज की है। पहली नज़र में यह आंकड़ा काफी मजबूत दिखाई देता है। इतना मजबूत कि इसने कई अनुमानों को पीछे छोड़ दिया। लेकिन इसी आंकड़े के सामने अब एक दूसरा सवाल खड़ा हो गया है – क्या 7.8 प्रतिशतकी यह ग्रोथ देश की अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर दिखाती है?
यह सवाल पूर्व वित्त और आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने उठाया है। उनके सवाल ने इसलिए भी चर्चा पैदा की है क्योंकि GDP के नए आंकड़े नई सीरीज और बदली हुई गणना पद्धति के तहत जारी किए गए हैं।
31 अगस्त को जारी आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से जून 2026 के बीच भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही। यह आरबीआई के करीब 7 प्रतिशत के अनुमान से भी अधिक है। लेकिन गर्ग का कहना है कि इस आंकड़े को समझने के लिए सिर्फ मौजूदा साल का नंबर देखना पर्याप्त नहीं होगा। पिछले साल के आंकड़ों में हुए बदलाव को भी साथ में देखना जरूरी है।
गर्ग की सबसे बड़ी आपत्ति पिछले साल के जीडीपी आंकड़े में हुए संशोधन को लेकर है। उनके मुताबिक, नए आंकड़ों में 2025-26 की पहली तिमाही के मौजूदा कीमतों वाले जीडीपी आंकड़े में बड़ा बदलाव हुआ है। उनका तर्क है कि अगर पिछले साल जारी किए गए आंकड़े को ही आधार माना जाता, तो मौजूदा कीमतों पर वृद्धि दर काफी कम दिखाई देती। इसी अंतर को लेकर वह सवाल कर रहे हैं कि 7.8 फीसदी की वास्तविक वृद्धि को किस तरह समझा जाना चाहिए।
यहाँ एक बात समझना जरूरी है। GDP के आंकड़ों में संशोधन होना अपने आप में असामान्य नहीं है। जैसे-जैसे ज्यादा आंकड़े उपलब्ध होते हैं, सरकार आर्थिक गतिविधियों की तस्वीर को अपडेट करती है। इस बार भी जीडीपी की नई सीरीज में आधार वर्ष को 2011-12 से बदलकर 2022-23 किया गया है। इसके अलावा कीमतों को मापने के लिए ज्यादा विस्तृत डेटा और नए इंडेक्स का इस्तेमाल किया गया है।
सरकार का कहना है कि पिछले आंकड़ों में बदलाव किसी मौजूदा साल की ग्रोथ को कृत्रिम रूप से ज्यादा दिखाने के लिए नहीं किया गया। सांख्यिकी मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, ये बदलाव नई जानकारी, बेहतर डेटा कवरेज और संशोधित पद्धति का हिस्सा हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अलग-अलग जीडीपी सीरीज के आंकड़ों को सीधे आपस में तुलना करना सही तस्वीर नहीं देता।
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यही वजह है कि इस पूरे विवाद को केवल सरकार बनाम आलोचक की बहस के तौर पर देखना शायद सही नहीं होगा। असली सवाल यह है कि जीडीपी के आंकड़ों को आम लोग कैसे समझें और क्या ये आंकड़े ज़मीन पर दिख रही आर्थिक गतिविधियों से मेल खाते हैं।
किसी भी अर्थव्यवस्था की ताकत सिर्फ एक प्रतिशत से तय नहीं होती। रोजगार, निवेश, खपत, उद्योग, कारोबार और लोगों की आय जैसे कई संकेतक मिलकर बताते हैं कि विकास का फायदा कितनी व्यापकता से पहुंच रहा है। 7.8 प्रतिशत की ग्रोथ निश्चित तौर पर एक महत्वपूर्ण आंकड़ा है, लेकिन उसके पीछे इस्तेमाल हुई गणना और आंकड़ों की पद्धति को समझना भी उतना ही जरूरी है।
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सुभाष गर्ग के सवालों का अंतिम जवाब आने वाले आंकड़ों और विशेषज्ञों की विस्तृत जांच से ही साफ होगा। फिलहाल सरकार अपने आंकड़ों पर कायम है और आलोचक उनकी व्याख्या पर सवाल उठा रहे हैं। इस पूरे विवाद से एक पुरानी लेकिन जरूरी बात फिर सामने आती है। आंकड़ा चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसकी असली कहानी समझने के लिए यह देखना जरूरी होता है कि वह बना कैसे है।





