अक्सर ऐसा कहा जाता है कि बिजनेस पैसों से नहीं बल्कि काबिलियत, विश्वास और अनुभव से खड़ा होता है। अगर बिजनेस को चलाने की सीख और तजुर्बा हर किसी के पास होता तो आज हर कोई एक दूसरे को टक्कर दे रहा होता। आज की स्टोरी में हम बात करेंगे एक ऐसे शख्स की जिन्होंने भारत को सिर्फ 20 रुपये के साथ छोड़ा था और आज अमेरिका उनका अरबों का कारोबार है।
वह कहते हैं न हार कर ही जीतने वाले को बाजीगर कहते है। रमेश वाधवानी भी एक ऐसे ही बाजीगर थे जिनके सामने कई चुनौतियां आई लेकिन वह उन चुनौतियों को मात देते हुए आगे बढ़ते चले गए और अब भारत के युवाओं के लिए बड़ा दांव खेल रहे हैं।
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यह कहानी है रमेश वाधवानी की
रमेश वाधवानी का नाम भारत से निकलकर अमेरिका में बड़ी कारोबारी सफलता हासिल करने वाले उद्योगपतियों में लिया जाता है। उनकी कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि अमेरिका पहुंचने के समय उनके पास बहुत सीमित पैसा था, लेकिन आगे चलकर उन्होंने तकनीक के क्षेत्र में ऐसी कंपनियां खड़ी कीं, जिनकी कीमत अरबों डॉलर तक पहुंची।
आज वह सिर्फ अपने कारोबार के लिए नहीं, बल्कि भारत में शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे काम के लिए भी जाने जाते हैं। वाधवानी का जन्म 1947 में कराची में हुआ था और विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया। उन्होंने IIT बॉम्बे से पढ़ाई की और इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए। 1969 में 22 साल की उम्र में अमेरिका पहुंचने के बाद उन्होंने वहां तकनीकी क्षेत्र में अपना करियर शुरू किया।
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IIT पास करने के बाद नौकरी न करने का किया फैसला
IIT से पढ़ाई पूरी करने के बाद वाधवानी ने अमेरिका के पिट्सबर्ग पहुंचे और कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। मास्टर डिग्री के बाद उन्होंने पीएचडी भी की और 1972 में पढ़ाई पूरी की। अपनी परीक्षा देने के बाद उन्होंने सोच लिया था कि उन्हें नौकरी नहीं बल्कि अपनी खुद की एंपायर बनानी है लेकिन उनके पास इतना पैसा नहीं था। पैसा न होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और एक दाव लगाया और अपनी जिंदगी की पहली कंपनी कम्प्यूगार्ड कॉर्पोरेशन (Compuguard Corporation) बनाई। काम था इमारतों में एनर्जी मैनेजमेंट और सिक्योरिटी के लिए सॉफ्टवेयर बनाना।
कंपनी को पूरी तरह से शुरू करने के लिए वाधवानी को करीब 1 लाख डॉलर की जरूरत थी जिसके लिए वह एक-एक इन्वेस्टर के पास जाते थे जिसमें उन्होंने कुल 125 वेंचर कैपिटल फर्म्स से संपर्क किया। सभी के इन्वेस्ट करने के लिए इंकार किया और तब वह अपने 125 इन्वेस्टर से मिले। इसी से उन्होंने कंपनी खड़ी की और 10 साल चलाया। कंपनी 1 करोड़ डॉलर तक पहुंच गई जिसके बाद उन्होंने अपनी कंपनी बेच दी थी।
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इसके बाद वाधवानी ने अमेरिकन रोबोट नाम की कंपनी संभाली। यह कंपनी उन्होंने तब संभाली जब इंडस्ट्रियल रोबोट्स का बड़ा दौर था और कंपनी में निवेशकों ने करीब 4 करोड़ डॉलर लगाए थे लेकिन फिर जापानी कंपनियों ने अमेरिका में कम कीमत वाले रोबोट उतार दिए। जिसके बाद उनकी यह कंपनी भारी लॉस में चली गई थी। करीब दस साल तक इस लॉस को झेलने के बाद फिर उठे।
इस कारोबार के बाद वाघवानी को बिजनेस के काफी हद तक दांव-पेच पता चल गए थे 1990 के आसपास उन्होंने पिट्सबर्ग छोड़कर सिलिकॉन वैली का रुख किया। पत्नी और बेटी के साथ नई शुरुआत की। इस बार कंपनी थी Aspect Development जिसमें कारोबारों के लिए सॉफ्टवेयर बनाना था। समय के साथ कंपनी बड़ी बनी और साल 2000 में i2 Technologies ने Aspect Development को 9.3 अरब डॉलर के शेयर सौदे में खरीद लिया। इस दौरान वाघवानी अरबपति बने। लेकिन इसके बाद कंपनी को फिर से मात पड़ी क्योंकि इंटरनेट ने कदम रख लिया था जिसके कारण टेक कंपनियों के शेयर धड़ल्ले से नीचे आ गिरे इसमें वाघवानी की कंपनी भी शामिल थी।
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इसके बाद उन्होंने Symphony Technology Group शुरू किया जिसका तरीका था मीडियम लेवल की टेक कंपनियों को खरीदना, उनमें बदलाव करना, कारोबार को बेहतर बनाना और फिर उन्हें आगे बढ़ाना। यहां तक कि रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि वाघवानी ने 40 से ज्यादा कंपनियां बनाई थी। आज वाधवानी की उम्र 78 साल है और उनकी संपत्ति करीब 5.5 अरब डॉलर है।
वाधवानी की कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन सोच और लक्ष्य बड़े होने चाहिए। अमेरिका पहुंचने के बाद उन्होंने नौकरी तक खुद को सीमित नहीं रखा और तकनीकी क्षेत्र में अपना कारोबार खड़ा किया। कारोबार में उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने निवेश और नई तकनीकों के साथ आगे बढ़ना जारी रखा।
अब वह अपनी संपत्ति और अनुभव का एक बड़ा हिस्सा अगली पीढ़ी के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत के युवाओं के लिए कौशल विकास, उद्यमिता और तकनीकी शिक्षा पर जोर इसी दिशा का हिस्सा है।





