संसद का मानसून सत्र पिछले कुछ दिनों से लगातार स्थगित होता जा रहा है। कभी विपक्षी दल हंगामा करके स्थगित होने की वजह बनती है तो कभी संसद में हो रहे मौखिक विवाद स्थगित कर देते हैं। संसद का मानसून सत्र लगातार ठप पड़ा है लेकिन असली सियासी लड़ाई सिर्फ हंगामे तक सीमित नहीं है। संसद में दो मुद्दे और है जो सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।
पहला विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम Foreign Contribution Regulation Act (FCRA) Amendment Bill 2026 और दूसरा परिसीमन (Delimitation) से जुड़ा प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक। संसद के मानसून सत्र में भारतीय जनता पार्टी (BJP) एक ऐसे राजनीतिक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां उसे दो बड़े विधेयकों के बीच संतुलन बनाना पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में सरकार के ऊपर धर्म-संकट बढ़ता हुआ नजर आ रहा है। ऐसा दिख रहा है कि अगर सरकार एक कदम लेगी तो दूसरा कदम मुश्किल हो सकता है। बता दें कि पिछले कई दिनों से संसद के भीतर विपक्ष लगातार प्रदर्शन और नारेबाजी करता दिखाई दे रहा है। दूसरी तरफ सरकार अहम विधेयकों को आगे बढ़ाने की कोशिश में है। लेकिन FCRA बिल पर जिन क्षेत्रीय दलों की नाराजगी सामने आ रही है, उन्हीं दलों के समर्थन की जरूरत भविष्य में परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन के लिए भी पड़ सकती है। यहीं से बीजेपी के लिए असली राजनीतिक गणित शुरू होता है।
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आखिर कहां फंसा है राजनीतिक गणित?
FCRA बिल को पास करने के लिए सरकार को सिर्फ साधारण बहुमत चाहिए लेकिन परिसीमन (Delimitation) से जुड़ा प्रस्तावित संविधान संशोधन के लिए अधिक संख्या में मंजूरी चाहिए जिसके कारण सरकार के लिए मुश्किल हालात पैदा हो सकते हैं। बताया जा रहा है कि BJP सरकार परिसीमन बिल को पास करने हेतु निरंतर NDA से बाहर की पार्टियों से संपर्क करने में जुटी है। DMK और NCP-SP जैसी पार्टियां इस फॉरेन कंट्रिब्यूशन अमेंडमेंट बिल 2026 के सख्त खिलाफ हैं वहीं दूसरी ओर YSRCP जैसी पार्टी संभलकर कदम बढ़ा रही है।
इंडिया टुडे ने NCP-SP, DMK, YSRCP और यहां तक कि बीजेपी के सहयोगियों सहित विभिन्न पार्टियों के शीर्ष सूत्रों से बात की कि FCRA बिल को लेकर उनका क्या रुख है। दक्षिण की एक क्षेत्रीय पार्टी ने FCRA बिल के मौजूदा स्वरूप पर अपनी चिंताएं जाहिर कीं। उन्हें उन संस्थानों पर संशोधनों के असर की चिंता है जो उनके कोर वोट बैंक से जुड़ी है। उनका कहना है कि नई सीटों के बंटवारे से राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है।
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इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक मतलब क्या है?
इस समय सरकार के सामने सिर्फ एक बिल पास कराने की चुनौती नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या वह FCRA पर सख्त रुख रखते हुए उन दलों का भरोसा बनाए रख पाएगी, जिनकी जरूरत आगे परिसीमन जैसे बड़े संविधान संशोधन के लिए पड़ सकती है।
बता दें कि अगर सरकार FCRA बिल के साथ समझौता कर उसे पास कराने से पीछे हट जाती है तो उन्हें अपने समर्थकों को बयान देना होगा कि बदलाव क्यों किया गया। वहीं अगर सरकार इस बिल को पास कराने में जुटी रहती है तो उन क्षेत्रीय दलों को साथ रखना मुश्किल हो सकता है, जिनका समर्थन आगे जरूरी हो सकता है।




